🔥 *विपराभ्यां जेः।1.3.19*
🔥 प वि:- वि-पराभ्याम् 5.2। जेः 5.1।
🔥 अर्थ: - वि-परा-उपसर्गपूर्वाद् जि-धातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति।
🔥 आर्यभाषा: - वि- परा-उपसर्गपूर्वक जि-धातु से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है।
🔥 उदाहरण: *(वि)* :- विजयते। जीतता है। *(परा)* :- पराजयते। हारता है।
*लोपः प्रकरणः*:- *अदर्शनं लोपः* १.१.५९ *प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः* १.१.६० *प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्* १.१.६१ *न लुमताsङ्गस्य* १.१.६२ अर्थ :- अदर्शन , अनुच्चारण की लोप संज्ञा है। अर्था...
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