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अष्टाध्यायी 1.3.29

🔥 *समो गम्यऋच्छिभ्याम्।1.3.29*
🔥 प वि:- समः 5.1। गमि-ऋच्छिभ्याम् 5.1। 
🔥 अनु.:- अकर्मकात्।
🔥 अर्थ: - सम्-उपसर्गपूर्वाभ्याम् अकर्मकाभ्याम् गमि-ऋच्छिभ्याम् धातुभ्यां कर्तरि आत्मनेपदं भवति। 
🔥 आर्यभाषा: - सम्-उपसर्गपूर्वक अकर्मक गमि-ऋच्छि धातुओं से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है। 
🔥 उदाहरण: - *गमि*:- संगच्छते।  *ऋच्छि*:- समृच्छते।

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