🔥 *निसमुपविभ्यो ह्रः।1.3.30*
🔥 प वि:- नि-सम्-उप-वि-भ्यः 5.3। ह्र 5.1।
🔥 अर्थ: - नि-सम्-उप-वि-उपसर्गपूर्वाद् ह्रः धातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति।
🔥 आर्यभाषा: - नि-सम्-उप-वि-उपसर्गपूर्वक ह्र धातु से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है।
🔥 उदाहरण: - *नि*:- निह्रयते।
*सम्*:- संह्रयते। उपह्रयते। विह्रयते। युद्ध के लिये बुलाता है।
*लोपः प्रकरणः*:- *अदर्शनं लोपः* १.१.५९ *प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः* १.१.६० *प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्* १.१.६१ *न लुमताsङ्गस्य* १.१.६२ अर्थ :- अदर्शन , अनुच्चारण की लोप संज्ञा है। अर्था...
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