🔥 *अधेः प्रसहने।1.3.33*
🔥 प वि:- अधेः 5.1। प्रसहने 7.1।
🔥 अनु.:- कृञः।
🔥 अर्थ: - अधि-उपसर्गपूर्वाद् प्रसहने अर्थे वर्तमानात् कृञो धातोः कर्तरि आत्ननेपदं भवति।
🔥 आर्यभाषा: - अधि-उपसर्गपूर्वक क्षमा अथवा अभिभव अर्थ में वर्तमान कृञ् धातु से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है।
🔥 उदाहरण: - शत्रुम् अधिकुरुते। शत्रु को क्षमा करता है या शत्रु को दबाता है।
*लोपः प्रकरणः*:- *अदर्शनं लोपः* १.१.५९ *प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः* १.१.६० *प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्* १.१.६१ *न लुमताsङ्गस्य* १.१.६२ अर्थ :- अदर्शन , अनुच्चारण की लोप संज्ञा है। अर्था...
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