🔥 *वेः शब्दकर्मणः।1.3.34*
🔥 प वि:- वेः 5.1। शब्दकर्मणः 5.1।
🔥 अनु.:- कृञः।
🔥 अर्थ: - वि-उपसर्गपूर्वाद् शब्दकर्मकात् कृञो धातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति।
🔥 आर्यभाषा: - वि-उपसर्गपूर्वक शब्दकर्मवाली कृञ् धातु से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है।
🔥 उदाहरण: - क्रोष्टा स्वरान् विकुरुते। गीदड़ स्वरो को बिगाड़ता है।
*लोपः प्रकरणः*:- *अदर्शनं लोपः* १.१.५९ *प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः* १.१.६० *प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्* १.१.६१ *न लुमताsङ्गस्य* १.१.६२ अर्थ :- अदर्शन , अनुच्चारण की लोप संज्ञा है। अर्था...
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