🔥 *वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः।1.3.38*
🔥 प वि:- वृत्ति-सर्ग-तायनेषु 7.1। क्रमः 5.1।
🔥 अर्थ: - वृत्ति-सर्ग(उत्साह)-तायनेषु अर्थेषु वर्तमानाद् वर्तमानाद् नियो धातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति।
🔥 आर्यभाषा: - वृत्ति- सर्ग(उत्साह) तायन अर्थों में विद्यमान नियः धातु से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है।
🔥 उदाहरण: - ऋचि *क्रमते* अस्य बुद्धिः। ऋग्वेद में इसकी बुद्धि गति करती है।
*लोपः प्रकरणः*:- *अदर्शनं लोपः* १.१.५९ *प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः* १.१.६० *प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्* १.१.६१ *न लुमताsङ्गस्य* १.१.६२ अर्थ :- अदर्शन , अनुच्चारण की लोप संज्ञा है। अर्था...
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