🔥 *वेः पाद-विहरणे।1.3.41*
🔥 प वि:- वेः 5.1। पादविहरणे 7.1।
🔥 अनु.:- क्रमः।
🔥 अर्थ:- पादस्य विहरणमिति पाद विहरणम्। पाद-विहरणे अर्थे वर्तमानाद् वि-परस्मात्वधातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति।
🔥 आर्यभाषा: - पाँव से चलने अर्थ में वर्तमान वि-से परे क्रम धातु कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होती है।
🔥 उदाहरण:- सुष्ठु विक्रमते वाजी। घोड़ा अच्छे प्रकार से चलता है।
*लोपः प्रकरणः*:- *अदर्शनं लोपः* १.१.५९ *प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः* १.१.६० *प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्* १.१.६१ *न लुमताsङ्गस्य* १.१.६२ अर्थ :- अदर्शन , अनुच्चारण की लोप संज्ञा है। अर्था...
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