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अष्टाध्यायी 1.3.46

🔥 *भासनोपसंभाषाज्ञानयत्नविमत्युपमन्त्रणेषु वदः।1.3.47*
🔥 प वि:- भासन-उपसंभाषा-ज्ञान-यत्न-विमति-उपमन्त्रणेषु 7.3। वदः 5.1। 
🔥 अर्थ: - भासन-उपसंभाषा-ज्ञान-यत्न-विमति-उपमन्त्रणेषु अर्थेषु वर्तमानाद् वदः धातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति। 
🔥 आर्यभाषा: - भासन-उपसंभाषा-ज्ञान-यत्न-विमति-उपमन्त्रण अर्थों में वर्तमान वद् धातु से कर्तृवाच्य में आत्मनेपद होता है। 
🔥 उदाहरण: - *भासन* व्याकरणशास्त्रे वदते। व्याकरण शास्त्र में दीप्यमान होकर उसके अर्थों को प्रकाशित करता है। 
*यत्न* क्षेत्रे वदते। क्षेत्र विषयक उत्साह को प्रकट करता है।

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