मा॒ता रु॒द्राणां॑ दुहि॒ता वसू॑नां॒ स्वसा॑दि॒त्याना॑म॒मृत॑स्य॒ नाभि॑: । प्र नु वो॑चं चिकि॒तुषे॒ जना॑य॒ मा गामना॑गा॒मदि॑तिं वधिष्ट ॥ ऋग्वेद ८.१०१.१५ ॥ ये एक मन्त्र ही बता देता है - गौ को माता उपमार्थ कहा गया है | गौ को माता को कहने का कारण - अमृत का उसकी नाभि में पाया जाना है | साथ में गौ रक्षा और उसकी कभी हत्या नही करनी चाहिए यह बात इस एक मन्त्र से स्पष्ट है |
*लोपः प्रकरणः*:- *अदर्शनं लोपः* १.१.५९ *प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः* १.१.६० *प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्* १.१.६१ *न लुमताsङ्गस्य* १.१.६२ अर्थ :- अदर्शन , अनुच्चारण की लोप संज्ञा है। अर्था...
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